अनुवाद- राजेश झा
कवि परिचय– नॉर्वे के प्रथम आधुनिकतावादी कवि रोल्फ जेकबसन (1907-1994) की कविताओं में प्रकृति और टेक्नोलॉजी के बीच तनाव की अभिव्यक्ति दिखाई देती है जिसकी वजह से इन्हें ‘ग्रीन पोएट’ भी कहा जाता है। इनकी कविताओं में आधुनिक बिंब का प्रयोग किया गया है। द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान नॉर्वे की नाजी पार्टी से थोड़े समय के लिए संबद्ध होने के बावजूद इन्हें स्कैंडिनेविया क्षेत्र की कविता में एक नयी शब्दावली और लय की शुरूआत करने वाला महान कवि माना जाता है। इनकी कविताएं अपनी सरल भाषा शैली, सामान्य लोगों से जुड़ाव और रोजमर्रा की वस्तुओं में जादुई आभा पैदा करने के लिए पहचानी जाती हैं।

१. अभिभावक देवदूत
सुबह सुबह तुम्हारी खिड़की पर आकर पंख फड़फड़ाने वाली चिड़िया मैं ही तो हूं
और तुम्हारा वही खास दोस्त, जिसे तुम कभी नहीं जान पाओगे,
और वे फूल भी जो अंधों के लिए जगमगा उठती है, मैं हूं।
जंगलों के पार चमक रहे ग्लेशियर, उफ कितने धुंधले..
और गिरजाघर की मीनार से आ रही भारी भरकम आवाजें भी
मैं ही हूं।
अचानक दिन-दोपहरी तुम्हारे दिल में कौंध जाने वाला खयाल
जो डुबो देता है तुम्हें अकल्पनीय खुशी में, मैं ही तो हूं।
मैं वही तो हूं जिसे बरसों बरस से चाहा है तुमने।
तुम्हारे साथ चलता हूं दिन रात, देखता रहता हूं तुम्हें अपलक
रख देता हूं अपना मुंह तुम्हारी छाती पर,
लेकिन शायद तुम्हें पता नहीं।
वही सफेद परछांई, जिसे तुम स्वीकार नहीं कर सकते
और जो तुम्हें भुला नहीं सकता, मैं ही तो हूं।
२. स्काईलैब
अपने कैप्सूल में तीन सप्ताह तक अंतरिक्ष का चक्कर लगाने के बाद अंतरिक्ष यात्री ने सोचा,
हम कितनी दूर आ गए हैं
और गलती से उसकी टांग भगवान की आंख में जा लगी।
वह सोचने लगा कि इतनी दूर आ चुका हूं मैं
कि अब फर्क नहीं बचा ऊपर और नीचे में, उत्तर और दक्षिण में, भारी और हल्के में
तो फिर कैसे समझ पाऊंगा मैं भले और बुरे का फर्क? इतनी दूर।
सीलबंद कमरे में भारहीन अस्तित्व-
हम तेज गति से उगते सूरज का पीछा करते हैं
हरी टहनी छूने के लिए, हाथ में कुछ वजनी उठाने के लिए
तड़प रहा है दिल। काश कोई पत्थर ही उठा पाता।
एक रात उसने देखा धरती मानो एक खुली आंख बन गयी थी
जो उसकी तरफ उसी गंभीरता से देख रही थी
जैसे मध्य रात्रि को जगे हुए बच्चे की आंख।
३. जुगनू
ये उस शाम की बात है जब हम वेलेर्टी के लिए
बस का इंतजार कर रहे थे
हमने गूलर के पेड़ के नीचे
एक दूसरे को चूमते दो बूढ़ों को देखा।
उसी वक्त तो तुमने आधा मुझे और आधा हवा को कहा था-
जिसने बरसों प्यार करते हुए बिताए हैं,
उसका जीवन व्यर्थ नहीं गया।
उसी समय अंधरे में पहली बार मुझे दिखी जुगनुएं
जो तुम्हारे सर के चारों तरफ रोशनी बिखेरती चक्कर लगा रही थी।
हां, तभी।
४. नाजुक सी सुई
रोशनी, कितनी नाजुक होती है
और कितनी कम पायी जाती है।
अंधेरा कितना विशाल होता है
घुप्प अंधेरी रात के बीच रोशनी, जैसे नाजुक सी सुई
सुनसान रास्तों से कितनी लंबी दूरी तय करनी होती है इसे।
इसलिए, हमें थोड़े प्यार से पेश आना चाहिए,
सीने से लगाना चाहिए
ताकि फिर सुबह यह आ सके रोशनी, दोबारा।
हमें उम्मीद है।
५. यहीं।
यहीं। इसी जगह।
झरने के किनारे और गुलाब की पुरानी झाड़ी के पास।
इस साल वसंत देर से आया, गुलाब पीले पड़े हैं, अब भी
तुम्हारे गालों की तरह, तकरीबन,
मौत के उस पार की पहली सुबह।
वसंत वापस आ रहा है,
लेकिन नहीं आएगी रोशनी, खुशबुएं भी नहीं आएंगी, आनंद भी नहीं,
नही आएंगे वापस।
लेकिन यहीं, इसी जगह
चांद के साथ गुजरी थी एक शाम,
झरनों की कलकल के साथ,
जैेस की अभी। थाम लो मेरा हाथ,
घेर लो अपनी बांहों से मुझे।
गरमियों की तरह हम दोनों साथ साथ जाएंगे चुपचाप,
उस तरफ, जो नहीं है अब।
६. जब वे सोते हैं
सोते हुए लोग बच्चों की तरह होते हैं
उनके अंदर कोई युद्ध नहीं होता
वे अपनी मु्ट्ठियां खोलकर
ठीक उसी लय में सांस लेते हैं जैसा ईश्वर ने उन्हें दिया है।
वे अपने होंठ वैसे ही सिकोड़ते हैं जैसे छोटे बच्चे
नींद में वे अपनी आधी मुट्ठियां भी वैसे ही खोलते हैं, जैसे छोटे बच्चे
फर्क नहीं पड़ता कि वे फौजी हैं या राजनयिक, नौकर या मालिक।
सितारे आसमान से पहरा देते हैं
और आसमान पर छा जाती है एक हल्की सी धुंध,
थोड़ी देर के लिए ऐसा वक्त आता है
जब कोई भी किसी को नुकसान नहीं पहुंचाता।
काश की हम एक दूसरे से कर पाते बात-
जब हमारे दिल होते हैं फूलों की अधखुली पंखुड़ियों की तरह।
सुनहरे भौंरों की तरह,
शब्द उमड़ते घुमड़ते, फूलों के करीब आते।
ईश्वर, हमें सिखाओ नींद की भाषा।
(ये कविताएं रॉबर्ट ब्लाई, रोजर ग्रीनवॉल्ड और रॉबर्ट हेडिन के अंग्रेजी अनुवाद से हिंदी में अनुदित की गयी हैं।)
(वागर्थ- नवंबर २०२५ में प्रकाशित)
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