मनुष्य और ब्रह्मांड- कविताएं

अनुवाद- राजेश कुमार झा

Composition, 1928 by Auguste Herbin.

एरिन हैनसन (Erin Hanson) की कवित

सुनो, आई हूं बताने अपना राज,
नहीं हूं वही जो थी मैं पहले कभी,
मेरे सामने जो पसरा है संसार,
सिर्फ उसे ही मैंने नहीं देखा।
मैंने उल्काओं की पूंछ पर किया है सफर,
सितारों के दिलों में बसे अंगारों में जली हूं मैं,
सुपरनोवा से टूटकर बिखरी हूं मैं यहां, वहां,
मैंने भोजन किया है सुदूर तैरती आकाशगंगाओं में,
सिखाया है चिड़ियों को गाना,
शनि ग्रह के धूल से पटे छल्लों पर होकर सवार,
नाची हूं मैं जिंदगी भर,
मैंने यहां बिताया है इतना वक्त कि जानती हूं मैं,
क्यों रोता है बेदमजनूं का पेड़।

सुनायी है मैंने ग्रह-नक्षत्रों को लोरियां,
जिसे सुनकर सो गया चांद।
देखे हैं मैंने बहते पानी के सोते,
और उन चट्टानों को भी जो रोक लेते हैं उसे,
जमी हुई थी मैं और पिघली भी रही हूं,
और फिर कभी होऊंगी दुबारा।
वैसे तो रहे हैं अरबों खरबों रूप मेरे,
लेकिन पहली बार धरा है रूप मैंने
जो मुस्कुरा सकता है।
मैं हूं इस ब्रह्मांड का एक टुकड़ा
जी रहा है जो अभी इंसान की तरह।

Eternal- Erin Hanson- English TextPoliakoff 2011

अल्फ्रेड के. लोमोट की कविता
मेरे डीएनए परीक्षण से पता चला है…..

मेरे डीएनए परीक्षण का परिणाम आ चुका है।
जैसा कि मुझे शक था, मेरे परदादा के परदादा
थे वही बड़ी वाली तितली।
आज जो कुछ हूं मैं,
रेंग रहा है वो किसी चट्टान के नीचे।
थोड़ा सा हिस्सा है मेरा इल्ली,
लेकिन थोड़ा सा हूं मैं गुंजन पक्षी भी,
मेरी हड्डियों की मज्जा में है डायनोसोर के जीवाश्म,
फिलिस्तीन के चारागाहों से पैदा हुए हैं मेरे सुनहले बाल।

चंगेज खां है रिश्ते में दूर का मेरा भाई,
हां, उसके गालों के गड्ढे नहीं आए मुझमें।
मेरे अंडकोशों में भरी है श्रीलंका के बरगद का बीज,
लेकिन मैं रावण की संतति हूं, राम की नहीं।
सुदूर इतिहास का हाथी है मेरा चचा,
मेरे लार में है गोरे लोगों के कुछ अवशेष।

3.7 अरब साल पहले सुनहले तूफान में ली थी अठखेलियां मैंने,
कल्पना की थी एक ग्रह की जिसमें बिखरे होंगे हर तरफ लिंग और योनि।
हाल में, शायद ईसापूर्व 60000 साल पहले,
अपने झबरीले पांवों से चहल कदमी कर रहा था मैं
बोत्सवाना को स्वीडन से जोड़ने वाले छारन पर।

सूरज और चांद की दोगली संतान हूं मैं,
अब मैं नहीं छुपा सकता
बारिश की बूंदों और पहाड़ी शेर की अपनी विरासत।
मैं तुम्हारी दादी के आंसू की बूंदों से बना हूं,
अपने ही रंग के दुश्मन कबीले को जीता था तुमने,
बांधकर जंजीरों में, समुद्र तट की ओर ले गए नंगा कर,
बेच दिया उन्हें सवाना के सौदागरों के हाथ।
मैं ही था वह भाई जिसे बेच डाला तुमने,
मैं ही था गुलामों का सौदागर,
जंजीर भी था मैं ही।

कर लो कबूल की हैं तुम्हारे पंख, विशाल और सुनहले,
ठीक मेरी तरह, हां मेरी तरह।
तुम्हारा भी पसीना है काला और खारा,
ठीक मेरी तरह, हां मेरी तरह,
तुम्हारे खून में भी बज रहा है एक गुप्त संगीत,
ठीक मेरी तरह, हां मेरी तरह।

ढोंग न करो की धरती नहीं है एक परिवार।
ढोंग न करो कि हम सब कभी साथ नहीं लटके थे एक ही पेड़ की टहनी से।
ढोंग न करो कि हमारी सांसो ने नहीं परिपक्व किया है एक दूसरे को।
ढोंग न करो कि हम यहां नहीं आए एक दूसरे को माफ करने।

My Ancestry DNA results came in by Alfred K. LaMotte- English Text

2 thoughts on “मनुष्य और ब्रह्मांड- कविताएं

  1. Vagish

    शानदार। शायद कविताओं में ही बची है विचारों की ऊष्मा और कवि ही जीवित हैं भविष्य को उम्मीद और समग्रता से देख पाने की अन्तःदृष्टि के साथ। इन कविताओं को पढ़ कर मनुष्य होने की तरफ एक ठोस क़दम बढ़ता हुआ लगता है। जियो।

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