माओरी कवि रोरे हपीपी की कविताएं

अनगढ़ लोग
(माओरी बटालियन के लिए)

कवि परिचय– रोरे हपीपी (रावले हबीब) (1933-2016) । माओरी कवि, नाटक-कार, रेडियो तथा टीवी पटकथा लेखक। इनके लेखन में न्यूजीलैंड के माओरी समुदाय के विस्थापन और शोषण का दर्द दिखाई देता है। माना जाता है कि रावले हबीब की रचनाओं ने पहली बार माओरी समुदाय के दुख-दर्द को न्यूजीलैंड की मुख्यधारा के सामने लाया।

(अनुवाद- राजेश कुमार झा)

तो वे यहां से आए, अनगढ़ लोग।
…..और अनगढ़ लोगों से ही आए अनगढ़ लोग।
काले लोग, चपटे चेहरे, झुके कंधों वाले तगड़े लोग,
खाकी में जंचते अनगढ़ लोग।

मटमैले-बादामी चमड़ी वाले,
काले होंठों, घने काले बालों वाले अनगढ़ लोग,
वर्दी पहनने को बने लोग।
तोबरुक के रेगिस्तान में शाबासी पाने वाले,
मरसा-मातरू की तपती दोपहरी में इज्जत पाने वाले,
ग्रीस में सम्मानित, न्यूजीलैंड की संतान, माओरी बटालियन, तुझे सलाम-
‘किआ ओरा कूतोऊ- किआ ओरा न्गा तामारिकी ओ औतिआरोआ’

हां, यहीं से आए हैं ये अनगढ़ लोग,
मध्यपूर्व के निडर हमलावर,
मेहनतकश, शेरों के दिल वाले,
टयुनीशिया में कंकड़ों की तरह बटोरते तमगे
ये अनगढ़ लोग।

शनिवार की दोपहरी नशे में मस्त वे आए मैखाने से,
दोपहरी ढलने के बाद पड़ोसी के घर से आए,
झूमते, लड़खड़ाते, पत्थरों से टकराकर डगमगाते
सुबह के नीम अंधेरे में जाते घर की ओर,
ये अनगढ़ लोग।

हां, यहीं से आए ये अनगढ़ लोग।
खुरदरी चिरी लकड़ियां, चौकोर लक्कड़
चीखते, पसीने को पीते आरा मिलों में,
काम करने मीलों चलकर अलसुबह आते,
हवा में उठती धुंध से मिलती सांस नथुनों में भरे,
आते ये लोग।

झाड़ियों से पटी पहाड़ियों की ढलानों पर,
बलखाती पगडंडियों से होकर, टंगी कुल्हाड़ियां कंधों पर,
घर को वापस आते ये लोग,
हो चुके हैं कदम अब तेज,
सरकारी लोगों की सुबह की सैर से कुछ अलग,
तेज कदम काम पर जाते लोग।
और जब बंद हो चुकी हैं मिलें, छा रहा है अंधेरा
शाम के वक्त आती आवाजें, तेज और साफ आवाजें,
धड़कती हवाओं में गूंजती आवाजें-
आ जाओ मेरे झोंपड़े में दोस्त,
रात की कुछ बोतलें बची हैं मेरे पास,
हम सब मिलकर करेंगे उन्हें साफ।

हां, यहीं से आए ये लोग,
खाकी वर्दी पहने लोग, ट्यूनिशिया के शेर,
काहिरा की बरसातों में गालियां देते लोग,
हेलवान की तपती गरमी में गाते-गुनगुनाते लोग-
एक हाथ में बंदूक तो दूसरी में गिटार, होंठों पे संगीत।
यही हैं हम।
जमकर करो काम, लड़ों जमकर-
‘सचमुच काम करने वाले नौजवान,
फख्र है हमें कि हम हैं उनके साथ’, वे कहते हैं हमें,
यही हैं हम।
गिटार और गाने।
सुबह की मिहनत, घबड़ाहट की खुश्की,
यही हैं हम।
बेचारी रांगी के पास अब भी बची है शराब,
अच्छा, मेरे यार कहां थे तुम कल रात?
नहीं, मैं पीता नहीं पर उड़ेल दो बोतल मेरे ऊपर,
मुझे पसंद है इसकी खुशबू।
जी हां, यही हैं हम।

हां, यहीं से आए वे अनगढ़ लोग।
गलियों में लड़ते। शराब खाने में भिड़ते। पार्टियों में झगड़ते।
दूसरों की बीबियों के साथ सोते,
होटल की नौकरानी के कमरे में रात बिताते,
सुबह खिड़की से कूदकर गलियों में सीटी बजाते,
मस्त, बेफिक्र घर की ओर
गहरी, बिना सपनों की नींद की आगोश में सोने जाते,
मगर हमेशा हंसते मुस्कुराते,
मोटे काले होंठों के बीच चमकते सफेद दांत,
थोड़ी कर्कश, थूक के गोले बनाती, बेफिक्र हंसी,
बातें करते बेलाग लपेट, थोड़ी कड़वी,
हां, यही हैं ये लोग।

यही है वह जगह जहां से आयी माओरी बटालियन।
आरामिल और घनी झाड़ियों वाले गांवों से,
रहते दूर दूर बसायी बस्तियों में,
सुनसान सड़कों के किनारे,
जिनसे आने जाने वाले लोग अक्सर पूछते-
अकेलापन नहीं होता तुम्हें कभी?
ठंढ में सूजे पैरों वाले बच्चे,
सर्दी के मौसम में बर्फीली सड़कों पर खाली पैर स्कूल को जाते बच्चे,
हां, यही हैं ये लोग।

भेड़ों की ऊन उतारने वाले कारखाने से आते हैं वे,
ऊन की दूकानों,
बिजली के बोर्ड,
झाड़ियों की सफाई,
लक्कड़ की चिराई करते हैं ये लोग।
ट्रकों को चलाते,
गायों को हांकते पीटते,
जानवरों को पोसते
बिना कमीज, रखे कंधों पर गैंती-कुदाली,
गलियों की पथरीली सड़कों को तोड़ते,
कहते, वाह वाह बहुत खूबसूरत गुजरा आज का दिन।
हां यही हैं वे लोग।

पनबिजली के काम से आए ये लोग,
इमारतें बनाने के काम में लगे लोग,
कोयला खदानों के लोग,
नंगी मांस पेशियां लहराते,
शान से अपना काम कर सीना फुलाते लोग,
धूल में पसीना मिलाते लोग।
सड़क के किनारे बच्चे लगाते ठहाके,
सड़क पर जाते ट्रक को देख,
दुहराते अपने मां बाप से सुने मजाक-
सरकारी विभाग यानी शैतान का दिमाग।
हां, यही हैं वे लोग।

हां, यही है वह जगह जहां से आए ये लोग,
मध्य पूर्व के राजकुमार,
आए हैं वे कारागारों, बच्चों के लिए बने सुधारगृहों से,
गांवों के स्कूल से आए बने शिक्षक, सरकारी मुलाजिम भी,
शहर में है एक दफ्तर- माओरी कल्याण केंद्र।
समंदर के किनारे सुनसान खेतों से,
हर पल लहरों के टकराने की जहां आती है आवाजें,
झुकी कमर,खिसियाया और परेशान, अनजान शहर में रूठा,
पहने खुली गरदन वाली कमीज।
नाचता है बेलगाम, फिल्मों में करता है शोर,
होंठों से लटकती सिगरेट,
खाता कागज में लिपटी मछली और सब्जी,
ढूंढते बिलियर्ड का कमरा,
यूं ही डोलता इधर उधर,
पीकर सड़क पर घूमता, चिढ़ते लोग।
मगर होते हैं अपवाद भी हर जगह,
कुछ लोग होते हैं शांत, गंभीर, चिंतन शील,
होता है जैसे अपवाद हर जगह।

हां, यही है वह जगह जहां से आए ये लोग, अनगढ़ लोग,
शराबखाने में अपनी खूबसूरत, भारी आवाज में गाते
माओरी संगीत,
गा रहे हैं हर ओर, खुल रहे हैं होंठ और हो रहे हैं बंद, हर ओर
दूर दूर जमा कर रखे हैं पैर,
सर पीछे की ओर,
गाने में मशगूल, खुल रही हैं आंखें और हो रही हैं बंद,
चलता रहता है संगीत लगातार।
घर पर भी पार्टियों में होता था गाना-बजाना,
मिस्र के रेगिस्तानों में भी होता था गाना-बजाना,
लीबिया के युद्ध क्षेत्रों में भी चलता रहता था गाना बजाना,
रोम की गलियों में भी जारी रहता था गाना बजाना,
जंग में जाते और वापस आते जारी रहता था गाना बजाना,
होता है हमेशा गाना और गिटार,
ऊपर भी, नीचे भी, आगे भी, पीछे भी,
चलता रहता है गाना, बजाना, नाच और मस्ती।

The Raw Men: Selected Poems 1954-2005. Volume 1 (O-a-tia Publishers, 2006).
Recorded 2008 by Rowley Habib at Matahiwi Marae, Hastings.

The Raw Men-Rowley Habib-English Text

औरत के हाथों के लिए
(एक युवा लेखक का निवेदन)

थाम लो मेरा हाथ और ले चलो
घनी झाड़ियों से होकर पहाड़ की चोटी पर
जहां बिखरी है खालिस बर्फ
ताकि हो जाएं मेरे खयालात बर्फ की तरह।
देखने दो मुझे नीचे समुंदर और खुले मैदानों की तरफ,
जिसे सहला रहा है दूर दूर तक पसरा
आसमानी कुहरे का धुंधलका-
ठीक वैसा ही जैसे कि तुम्हारी ये आंखें
जो पीने को हैं तैयार इस दुनिया को और इससे भी आगे।
लिटा दो मुझे बर्फ की झक सफेद चादर पर
और मेरा वजूद करता रहे महसूस कि तुम हो मेरे करीब।
मेरे नथुनों में बसी हो तुम्हारी खुशबू।
थाम लो मेरा हाथ,
औरत के नर्म और मोहब्बत से सराबोर हाथों के बिना
मैं खोया सा हूं जैसे।
मेरे बुलावे के जज्बातों को दो कामयाबी,
थाम लो मेरा हाथ,
नहीं तो आएगी प्रेरणा और पाएगी मुझे
बिलकुल सपाट और पूरी तरह मुर्दा।

To the Hand of the Woman- Rowley Habib- English Text

अपने भाई बहनों के लिए

हम और तुम इतने दूर तो न थे,
जब काले आसमान में कड़की थी बिजली
इतने दूर तो न थे हम और तुम।
और जब तिरछे होते दिन में,
बादलों की गूंज लुढकती चली गयी थी दूर,
सपने देखे थे हमने
पर इतने दूर तो न थे हम और तुम।
जब परदे के पीछे बिजली कौंधी थी,
सिर्फ मैंने ही नहीं महसूस की थी जन्नत,
नहीं, इतने दूर तो नहीं थे हम और तुम
जब पगलायी मस्ती में पानी गुजरा था
फूलों के बगीचे में
केवल मेरा ही सपना तो नहीं थो वो
जो बहकर चला गया मेरी रसोई की खिड़की से दूर,
जैसे कहीं दूर बौराई नदी में बह गयी हो कोई ख्वाहिश।

To my brothers and Sisters-Rowley Habib- Maori Poet- English Text

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