सिंधी कविताएं

अनुवाद- राजेश कुमार झा

Painting by Mahnoor Shah (2015)
(https://fineartamerica.com/featured/002-pakhtun-b-mahnoor-shah.html)

इमदाद हुसैनी की कविताएं


कवि परिचय– इमदाद हुसैनी (जन्म 1940, सिंध, पाकिस्तान)-कवि, लघुकथा लेखक, गीतकार। वे अपनी बिंदास शैली और बेबाक कथ्य के लिए जाने जाते हैं। उनकी कविताएं गहरे तौर पर राजनीतिक हैं। फासीवाद का उदय, वियतनाम युद्ध, मानवता के सामने खतरे, अवसाद और मानवजीवन की निरर्थकता जैस विषय उनकी कविताओं में दिखाई देते हैं। 1970 के दशक में वे सिंधी कविता की आधुनिक धारा के स्तंभ के रूप में जाने जाते हैं।

पुराना मकान 

खाली मकान की तरह हो चुका हूं मैं, 
जिसके दरवाजे और खिड़कियां,
चिराग, परदे और आलमारियां,
आइना और उसमें दिखता था कभी जिसका अक्स,
सभी हैं बिकने को तैयार, 
होने वाली है नीलामी।

खाली मकान की तरह हो चुका हूं मैं,
इसमें रहने वालों की चाहतें और ख्वाहिशें,
बन चुकी हैं मानो कूड़े का ढेर।
किसी गड़े खजाने की तलाश में यूं ही,
उखाड़ फेंके हैं उन्होंने फर्श के पत्थर,
बना दिया है इसे नंगा।

इसमें क्या बचा है मेरे लिए-
कुछ भी नहीं।
छत से लटक रहे हैं चमगादड़,
दीवारों पर सूख रहे हैं उपले।

The Old Building -Imdad Husaini-Sindhi- English Text

जिंदगी

गैस की कोठरी है ज़िदगी,
बस बटन दबाओ,
नसों में धधक उठता है गैस का बबूला,
बस एक माचिस लगाओ,
दिल की जगह सीने में धड़क रहा है टाइम-बम,
टिक
टॉक
टिक
टॉक
टिक टॉक।
बाकी आवाजें गुम हो चुकी हैं भारी भरकम दरवाजे के पीछे,
कबूतर नहीं गिद्ध है अब,
राष्ट्रसंघ का निशान,
सभी सपने, आस्था,
बन चुके हैं लाश, बस सड़ती हुई लाश।

Life-Imdad Husaini- Sindhi poet- English Text-
https://docs.google.com/document/d/15YO0X9ZosoEvJJq-K9ktKGAbCa-Z8NMFauJaLPjZiQs/edit?usp=sharing

समंदर


समंदर पूछता है मुझसे,
कहां है वो जिसकी आंखें थीं नीली,
क्यों सीपियों में बनता नहीं अब मोती,
क्यों नहीं बारिस की बूंदें गाती हैं मल्हार?

चांद पूछता है मुझसे,
क्यों नींद से नहीं जगा है सूरज
किसी दीवार के पीछे
क्या मंद मंद बहने वाली हवा है कैद,
कमल क्यों नहीं मुस्कुराते?

नहीं करो मुझसे बात, कर दो मिलने से इंकार,
मगर सूरज और चांद को क्यों देती है सजा,
समंदर तुम्हारे लिए करवटें लेकर बिता रहा है वक्त,
चांद कर रहा है रत जगा, हर रात।
Sea-Imdad Husaini-Sindhi-English Text

मला


छुप कर हमला किया है वक्त ने,
दुनिया के सीने में धंसा है अंधेरी रातों का खंजर,
हमेशा की तरह खत्म हो चुकी है ऊर्जा।
मस्जिद से मुअज्जिन ने दी आवाज,
और फिर हो गया चुप।

म्यूजियम में बुद्ध की मूर्ति गिरी नीचे औंधे मुंह,
चकनाचूर हो गयी बांसुरी,
चुप हो गए सभी सुर ताल।
यूनान के महापुरुष ने पी लिया जहर का प्याला,
बिना बाप के बच्चे को चर्च की सीढ़ियों पर छोड़, 
चली गयी कुंवारी मेरी।

काले चादर से ढंका है शहर का मुर्दा बदन,
हर बदन से चिपकी है कब्रिस्तान की सियाही।
हर तरफ से बढ़े आ रहे हैं गम और तनहाई के प्रेत,
सन्नाटे के डाकू और चुप्पी के चोर,
शहर की गलियों में हो चुके हैं दाखिल।

तेज और ठंढी हवाएं दे रही हैं दरवाजे पर दस्तक,
शहर की शोकसभा में आने की दे रही हैं दावत,
कम से कम कुछ लोग तो हो जाएं शामिल,
नर्क के उत्सव में कुछ चीखें तो हो जाएं दाखिल।

The Attack-Imdad Husaini-Sindhi- English Text

शेख अयाज की कविताएं


कवि परिचय– पाकिस्तान के सिंध में पैदा हुए शेख अयाज (1923-97) की गिनती आधुनिक सिंधी के महानतम कवियों में की जाती है। माना जाता है कि सिंधी कविता में प्रगतिशील आधुनिक युग की शुरुआत शेख अयाज से हुई। उन्हें 18वीं सदी के सूफी कवि शाह अब्दुल लतीफ भिताई के शाह जो रिशालो के अनुवाद से बड़ी प्रसिद्धि मिली।


चीजें बोलती हैं


चीजें भी बोलती हैं,
क्या सुन सकते हो तुम?
यही है वो तंबूरा जिसे भिटाई*  बजाते थे,
इसके तारों से खिलते थे फूल,
सभी पर बरसाते थे खुशबू।
यही है वो करघा
बुनते थे कपड़ा जिसपर कबीर,
और ताने बाने में सिमट आती थी कायनात।
यही है वह फंदा,
जिसपर झूले थे नाना साहब,
झूल रहा है अब भी हवाओं में,
पता नहीं कर रहा है किस गरदन का इंतजार।
मेरी नज़्मों को चाहते हो समझना,
तो सुनो, 
इतिहास के म्यूजियम में चीजो को बोलते।
Things-Sheikh Ayaz- Sindhi-English Text


ज़ुर्म


मैं कबूल करता हूं अपने ज़ुर्म,
हां मैंने किए हैं बहुत से ज़ुर्म।
गंदे पानी में खिलते कमल,
और अंधेरी रात में उड़ते परिंदे भी हैं मुज़रिम।
हां, नई मिट्टी से गढ़े हैं मैंने इंसान,
यह भी तो है ज़ुर्म।

हां, कबूल करता हूं मैंने किए हैं ज़ुर्म।
बुलंद आसमान को छोड़कर मैंने,
किया है प्यार अपनी मां, इस प्यारी धरती से,
मस्ती भरी रातों की कशिस से किया है इंकार,
तड़प कर किया है चमकीली सुबह का इंतजार।

उड़ा हूं दिल फरेब बादलों के संग,
धरती पर उतरा हूं चमकीली रोशनी के साथ,
हां, कबूल करता हूं किए हैं मैंने जुर्म।
मैंने धरती पर बनायी है मोहब्बत की इबादतगाह,
और ढाह दी है तुम्हारी बनायी,
नफरत की दीवार।

मैंने गाए हैं मोहब्बत के तराने,
खेआ है अपनी धरती को नयी दिशाओं में।
मैंने गाए हैं आज़ादी के तराने,
गुलामों की गरदनों से काट डाले हैं लोहे के जंजीर,
इन जादुई गीतों ने तोड़े हैं 
सदियों की दासता के फंदे।

मेरे आंसुओं को देखकर समझते हैं लोग
कि है शायद कोई कीमती मोती।
हां, कबूल करता हूं अपना ज़ुर्म।
बस एक ही हुनर है मेरे पास,
मेरे साजों की हो रही है तलवारों से जंग,
लोहे के तुम्हारे दीवारों से टकरा रहे हैं मेरे नगमे।
थरथरा रहे हैं तुम्हारे विशाल किले,
बड़े बड़े हथियारों के साथ तुम हो चुके हो कमज़ोर,
हां, कबूल करता हूं अपने ज़ुर्म।

भेज दोगे तुम मुझे फांसी के फंदे पर,
मगर मैं ज़िदा वापस आऊंगा,
ज़िदगी का झरना हूं मैं,
बहता रहेगा बदस्तूर, मैं रहूं न रहूं,
मैं अपनी राख से ज़िंदा वापस आऊंगा,
जैसे कंधे पर लिए सारंगी, दोतारा,
आता है खानाबदोश गवैया,
हां कबूल करता हूं अपना ज़ुर्म।

I accept my Crimes-Shaikh Ayaz-Sindhi poet-English Texgt

आज़ादी


कौन कहता है यहां नहीं है आज़ादी,
सियार आज़ाद हैं यहां,
मक्खियां भी हैं यहां आज़ाद,
पंडित-विद्वान आजाद हैं यहां,
टीवी भक्ति संगीत गाने को आजाद हैं कवि।
किसान आजाद हैं-
चाहें तो निकाल सकते हैं जूं अपने बालों से, न चाहें तो नहीं।
इस दरकती धरती पर सभी हैं आज़ाद,
जहां दरारों में छिपे बैठे हैं सांप,
और भेड़िये अपने बच्चों के लिए बना रहे हैं मांद।

Freedom-Shaikh Ayaz-English Text- https://docs.google.com/document/d/1u-YUsn2sohI0C3afeCTfj8eRziccgGuYL7u76GrIKWE/edit?usp=sharing

(वागर्थ में प्रकाशित)

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