दनुशा लमेरिस की कविताएं

अनुवाद- राजेश कुमार झा

दनुशा लमेरिस अमरीका में रहती हैं। उनकी कविताओं के संग्रह The Moons of August को 2013 में Autumn House Press पुरस्कार के लिए चुना गया था।  वे कहती हैं कि अपनी भाषा नहीं बोल पाना एक तरह का देश-निकाला है जिसका व्यक्ति पर गहरा असर होता है। उनकी दो कविताओं का अनुवाद

Lamaris poem tinyletter

अरबी

अब तो याद नहीं वो आवाजें,
उठती थी जो मेरी छाती की हड्डियों के पिंजर से,
हालांकि बेरुत की तपती सडकों पर लड़कियों के साथ खेलते हुए लंगड़ी दौड़,
बोलता था मैं वही सुनहली जुबान।

नींबू पानी के लिए पुकारते थे अपनी अम्मियों को,
काम के बाद घर वापस जाते लोग जब रुक कर
देते थे पैसे मीठी गोलियों के वास्ते,
कहते थे हम उन्हें शुक्रिया।

बाजार में कसाइयों, खजूर और रोटी बेचने वालों का मोलभाव करना,
मैं समझता था।
घुंघराले बालों वाले खच्चर के कान में अरबी में
बुदबुदाता था अपने प्रेम की दास्तान,
स्कूल में अरबी में ही गाता था गाना,
रात में सपने भी देखता था अरबी में।
एक कहावत भी तो है अरबी मैं,
समझदार ही उदासी झेलते हैं।

उस समय क्या पता था मुझे,
होता है क्या कभी खत्म न होने वाले नुकसान का सिलसिला।
बीते हुए वक्त में दफनाया है मैंने,
एक प्रेमी,एक भाई, एक बेटा।
रात के वक्त फट रहे बमों के दबे दबे से धमाकों ने,
शहर की किनारी को कर दिया है तार तार।
और लड़कियां?
पता नहीं क्या क्या खोया है उन्होंने।

एक छोटे से वक्त के लिए मैं जग गयी थी,
उस इंसान के लिए जो अरबी में मेरे कानों में फुसफुसाता,
और झकझोर देता मेरी छाती की हड्डियों के पिंजर,
कहता दुहराने हर एक लफ्ज,
काई लग चुके मेरे गले से निकाल लेता शब्दों के टुकड़े,
कहता, देखो, अब भी वे लफ्ज हैं यहीं।
अब तो हो चुकी हैं वे स्मृतियां भी धुंधली,
हो सकता है वह कह रहा हो सही।

गुजर जाता है जो वह भी पूरी तरह नहीं गुजरता,
भाषा तो नहीं
मगर उसकी हड्डियों का ढांचा अटका रहता है कहीं,
प्रेमी तो नहीं,
पर हमारे शरीर के अंदर उसका बनाया अंधेरा बिस्तरा,
बचा रहता है कहीं।

English Text of the poem ‘Arabic’
http://drive.google.com/open?id=1ZnxyVMiUjXidI86BBJnBagf07xO3WpZh

छोटी छोटी इनायतें

सोच रही थी मैं,
कि खचाखच भरे जहाज में गुजरते हुए,
कैसे लोग मोड़ लेते हैं अपने घुटने ताकि आप जा सकें आराम से।
कैसे अनजान लोग बोल उठते हैं जीते रहो,
आती है जब किसी को छींक,
शायद उस प्लेग के जमाने से चल रही रिवायत जब हम कहते थे- मरना नहीं।

और कभी जब आपका झोला छूट जाता है हाथों से,
बिखर जाती है सड़क पे सब्जियां, नींबू,
कोई न कोई बंटाता है हाथ सब्जियां वापस समेटने में।
अमूमन हम नहीं चाहते करना नुकसान एक दूसरे का।

चाहते हैं हम कि मिले कॉफी गरमा गरम,
कहते हैं शुक्रिया उसे, जो थमाता है हमें कॉफी का प्याला,
वेटर जब प्यार से सजाता है खाने की प्लेट,
डालता है सब्जियां, रोटी, मिठाई, आइसक्रीम,
करते हैं इंतजार उसकी मुस्कुराहट का और बदले में मुस्कुराते हैं हम भी।
जब ट्रक का ड्राइवर कर लेता है गाड़ी धीमी हमारे लिए,
दिल के कोने से कहीं आती है आवाज शुक्रिया।

कितना थोड़ा सा बचा है हमारे बीच साझा,
कितनी दूर आ चुके हैं हम अपनी आग, अपने कबीले से,
शायद यही छोटे छोटे पल हैं बचे करने को साझा।
कहीं यही तो नहीं भगवान का घर?
ये छोटे छोटे क्षणभंगुर पलों के मंदिर,
बनाते हैं हम जिन्हें, जब कहते हैं-
‘आइए इस सीट पर बैठिए मेरी जगह,
-पहले आप,
कितनी अच्छी है आपकी साड़ी।’

English Text of the poem-Small Kindnesses
https://drive.google.com/open?id=1-EICWSMgH_9j1tH2w-oEPNvMwMoHdYjL



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