ताहा मुहम्मद अली की कविताएं (फिलिस्तीन)

(अनुवाद- राजेश कुमार झा)

Taha Muhammad Ali- Palestine

कवि परिचय– जन्म 1931, मृत्यु 2011- फिलिस्तीन। ताहा मुहम्मद अली फिलिस्तीन के महान कवियों में गिने जाते हैं। उनकी कविताओं में व्यक्तिगत अनुभवों और राजनीतिक परिस्थितियों का अद्भुत समन्वय देखने को मिलता है। सरलता से कही गयी उनकी कविताएं अपने व्यंग्य और सीधे सीधे असर करने वाली शैली के लिए जानी जाती है।)

 पलायन

सड़कें सुनसान,
जैसे फकीर की स्मृति।
धधक रहे चेहरे,
जैसे जलते हैं बलूत के फल,
मानो
कहीं दूर क्षितिज पर,
घरों की देहरी पर,
इकट्ठा हो रही हो आत्माएं।

रिस नहीं सकता खून इससे ज्यादा,
जितना बह चुका है नसों से।
नहीं हो सकती चीख इससे ऊंची,
हो चुकी है जितनी अब तक।
हम हटेंगे नहीं।

बाहर कर रहे हैं सभी इंतजार,
आने वाली हैं ट्रकें और कारें,
बंधकों से लदे, शहद से भरे।
हम हटेंगे नहीं।

घिरने और कुचले जाने के पहले,
टूटकर बिखर रहे हैं रोशनी के बख्तर,
सभी जाना चाहते हैं बाहर, मगर,
हम हटेंगे नहीं।

नकाबों के पीछे दूधिया दुल्हनें,
कर रही हैं इंतजार,
गुलामी की चुंधियाती रोशनी में हो रही हैं दाखिल,
आहिस्ता आहिस्ता
और बाहर खड़ा हर इंसान चाहता है कि चले जाएं हम, मगर,
हम हटेंगे नहीं।

बेर के जंगलों पर बरस रही हैं बड़ी बड़ी बंदूकें
हो रहे हैं चकनाचूर सपने पारिजात फूलों के,
गायब हो रही हैं रोटियां, मारे जा रहे नमक,
उमड़ रही है प्यास, सूख रही है कंठ और हमारी आत्मा भी।
बाहर पूछ रहे हैं सभी,

‘किसका इंतजार कर रहे हैं हम?
उष्णता से किए जा चुके हैं बेदखल,
हवाओं पर भी हो चुका है कब्जा।’
फिर क्यों नहीं जा रहे हम?
मुखौटों ने भर दिए हैं,
धर्मोपदेशकों के ऊंचे सिंहासन और वेश्यालय,
वजू की जगहें।

विस्मय से मुखौटों की आंखें हो गयी हैं भैंगी,
साफ दिख रही है चीजें मगर यकीन नहीं होता,
अचंभित हो, छटपटाते गिर रहे हैं,
जैसे कीड़े या हो इंसान की जीभ।
हम हटेंगे नहीं।

क्या हम अंदर हैं सिर्फ इसलिए,
कि निकल सकें बाहर?
निकलते हैं सिर्फ मुखौटे,
सम्मेलनों या धर्म-सिंहासन के लिए।
निकलना हो जरूरी तो निकलो,
अंदर की फांस से,
बद्दुओं के अंडकोशों की गिरफ्त से,
बिरादरों के दागदार हो चुके पिंजड़ों से,
कौओं की सड़ांध से, तलवार की धार से।
हम हटेंगे नहीं।

बंद कर रखे हैं उन्होंने निकलने के रास्ते,
दे रहे हैं दुआएं बहुरूपियों को,
भेज रहे हैं दरख्वास्त, कर रहे हैं प्रार्थनाएं,
हमारी मौत के।

Exodus-Taha Muhammad Ali-Palestine-English Text

peter-feghali-445901
Photo by Peter Feghali on Unsplash

समुद्री कस्तूरी

मिटा दिए गए हैं हमारे निशान,
छिपा दी गयी है हमारी पहचान,
अवशेष कर दिए गए हैं गायब,
रास्ता दिखाने के लिए,
बचा नहीं है कोई रहनुमा।

अब उम्र ढल चुकी है,
लंबे होने लगे हैं दिन।
दुनिया से जुड़े होने का अहसास भी न होता मुझे-
अगर न होतीं तुम्हारी जुल्फें,
बड़सीम की फलियों जैसी भूरी-सुनहरी,
कपूर की खुशबू से भरी,
दूध की महक से सराबोर,
अलसाती जैसे अरबी चमेली,जो होती थी कभी यहां,
सितारों की तरह धड़कती।

धोखेबाज है यह धरती,
नहीं कर सकते इस पर भरोसा,
भुला देती है मुहब्बत को।
वेश्या है यह धरती,
बंदरगाह की गोदी पर,
बीते वक्त के सामने पसारे अपने हाथ,
लगाती है नृत्यशालाएं,
मुस्कुराती है हर जुबान में,
पोसती है अपने पिछवाड़े से सभी आगंतुकों को धीरे धीरे।

यह धरती करती है बेदखल,
देती है धोखा, करती है फरेब,
इसकी रेत में नहीं है जगह हमारे लिए,
भुनभुनाती है, करती है हमें नापसंद।
जहाजी और हमलावर हैं इस धरती के नवागंतुक,
जो घर के पिछवाड़े में उखाड़ देते हैं फुलबाड़ी,
दफन कर देते हैं पेड़।
रोकते है हमें निहारने से कुमुदिनी के फूल और पवनपुष्प,
छूने नहीं देते पौधों, झाड़ियों, चुकंदर और चिकोरी की फली।

जहाजियों के साथ हमारी धरती मनाती है रंगरेलियां,
नवागंतुकों के सामने उतार देती है अपने वस्त्र,
रख देती है उनकी जांघों के बीच अपना सर,
बोलकर अनजानी जुबान हो जाती है बदनाम, अपवित्र,
शायद कुछ भी नहीं जोड़ती इसे हमसे।

और मैं,
अगर होती न तुम्हारी भूरी सुनहरी जुल्फें,
जैसे बड़सीम की फलियों का दूध,
रेशम की खुशबू की तरह नर्म,
न होती अगर कपूर की खुशबू, तुलसी के पत्ते,
अगर न होती समुद्री कस्तूरी
मैं न जान पाता इसे,
न करता प्यार,
न जाता करीब,
इस वेश्या के।
तुम्हारी जुल्फों ने ही बांध रखा है मुझे,
फांसी के फंदे की तरह।

Ambergris-Taha Muhammad Ali-Palestine-English Text

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टहनी

न संगीत,
न शोहरत, न दौलत,
यहां तक कि कविता भी नहीं
दे सकती दिलासा, क्योंकि,
जिंदगी है इतनी छोटी,
किंग लीयर खत्म हो जाता है बस अस्सी सफों में,
जिंदगी हो सकती है तबाह अगर बच्चे हो जाएं बाग़ी।
तुम्हारे लिए मेरी मोहब्बत है शानदार,
लेकिन मैं, तुम और शायद दूसरे भी हैं
मामूली इंसान।

मेरी कविता है कहीं कविताओं से आगे,
क्योंकि तुम हो औरतों से कही अलहिदा औरत,
और इसलिए मुझे लग गए साठ बरस,
यह समझते समझते कि
पीने की चीजों में सबसे बेहतरीन है पानी,
खाने में रोटी से लजीज कुछ भी नहीं।
हर फन है बेकार,
गर पैदा न कर सके इंसान के दिल में थोड़ा,
हैरत का अहसास।

हमारे कर्मों की थाती,
हसरतों के खजाने,
ख्वाबों, अहसासों पर,
हमारी मौत के बाद,
थकामांदा दिल जब मूंदेगा अपनी पलकें आखिरी बार,
तो सबसे पहले मिट्टी में दफन होगी,
हमारे दिलों में पैबस्त नफरत।

Twigs- Taha Muhammad Ali-Palestine-English Text

Palestinian wheelchair bound man

बदला

सोचता हूं,
जिसने मेरे पिता का कत्ल किया,
जमींदोज कर डाला मेरा घर,
निष्कासित कर दिया हमें एक संकरे से मुल्क में।
अगर मार डालता मुझे
तो आखिर मिल जाता सुकून मुझे।
और अगर तैयार होता मैं,
जरूर बदला लेता।
xxx

मगर दुश्मन सामने आता
और मुझे पता चलता
कि उसकी मां है,
जो कर रही है उसका इंतजार,
बाप उसका सांस रोके,
कांपते दिल से बाट जोहता है बेटे की
आने में हुई है जिसे बस पंद्रह मिनट की देरी।
तो फिर मैं उसकी जान नहीं लेता
भले ही मुमकिन था मेरे लिए कत्ल करना।
xxx

मैं उसका कत्ल नहीं करूंगा
अगर किसी ने बता दिया मुझे कि,
उसके भाई हैं, बहनें भी, जो
करते हैं उससे प्यार और
बीबी करती है दरवाजे पर उसका इस्तकबाल,
बच्चे सह नहीं सकते उसकी जुदाई,
चहक उठते हैं उससे पाकर तोहफा।
या हैं उसके संगी साथी,
पड़ोसी जो जानते हैं उसे,
कैदखाने में मिला कोई सहयोगी,
या अस्पताल में बने दोस्त,
स्कूल के दिनों के सहपाठी,
जो पूछते हैं उसका हालचाल,
करते हैं उससे दुआ-सलाम।
xxx

लेकिन अगर वह होगा केवल वही,
पेड़ से कटी टहनी की तरह अलग थलग,
न होगी उसकी कोई मां, न होगा बाप,
न भाई, न बहन,
बीबी भी नहीं और न ही बच्चे,
न कोई सगा संबंधी, न पड़ोसी,
दोस्त भी नहीं, सहयोगी-सहकर्मी नदारद,
तो फिर मैं उसके अकेलेपन के ग़म को,
बढाऊंगा नहीं मौत के खौफ से,
बल्कि खुश होऊंगा मैं,
उसे सड़क पर गुजरते नजरअंदाज कर,
क्योंकि मुझे यकीन हो चुका है कि
उसे नजरअंदाज कर देना ही है,
उससे बदला लेना।
xxx

Revenge-Taha Muhammad Ali-Palestine-English Text

One thought on “ताहा मुहम्मद अली की कविताएं (फिलिस्तीन)

  1. वागीश

    So evocative and poignant! The translation seems so very authentic that it is difficult to think if it is not composed in Hindi. Kudos!!

    Like

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